भारत एक ऐसा देश है जहाँ आस्था और न्याय, दोनों की गहरी जड़ें समाज में समाई हुई हैं। यहाँ धर्म के मार्ग पर चलने वाले लोग भी उतने ही सम्मानित माने जाते हैं, जितने कि संविधान और कानून के रक्षक। इसी संतुलन के बीच हाल ही में एक मुद्दा देशभर में चर्चा का विषय बना है — बागेश्वर धाम के पं. धीरेंद्र शास्त्री महाराज की प्रस्तावित “सनातन एकता पदयात्रा” और उससे जुड़ा विवाद। इस विवाद का केंद्र हैं दामोदर यादव, जिन्होंने यह घोषणा की है कि वे इस पदयात्रा को रोकने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर करेंगे।
इस घोषणा ने अचानक से मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर बहस छेड़ दी। कुछ लोग दामोदर यादव के कदम को “कानूनी रूप से उचित और सामाजिक रूप से आवश्यक” बता रहे हैं, तो कुछ इसे “धार्मिक आस्था पर हमला” मान रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि यह मुद्दा केवल आस्था बनाम विरोध का नहीं, बल्कि कानून, धर्म और समाज के त्रिकोण से जुड़ा मामला है।
🔹 बागेश्वर धाम और पं. धीरेंद्र शास्त्री की लोकप्रियता
पं. धीरेंद्र शास्त्री महाराज, जिन्हें आम लोग बागेश्वर धाम सरकार के नाम से जानते हैं, पिछले कुछ वर्षों में भारतीय आध्यात्मिक जगत के सबसे चर्चित नामों में से एक बन गए हैं। मध्य प्रदेश के गढ़ा बागेश्वर धाम से संचालित उनका दरबार हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
वे “हिंदू एकता” और “सनातन संस्कृति” के प्रचार-प्रसार के लिए जाने जाते हैं। उनकी कथाओं और प्रवचनों में राष्ट्रवाद, धर्म-संरक्षण और सामाजिक जागरूकता जैसे विषय प्रमुख रहते हैं।
🔹 सनातन एकता पदयात्रा क्या है?
“सनातन एकता पदयात्रा” पं. धीरेंद्र शास्त्री द्वारा प्रस्तावित एक धार्मिक-सांस्कृतिक अभियान है, जिसका उद्देश्य बताया गया है — समाज में सनातन धर्म के प्रति एकता, जागरूकता और गौरव की भावना को बढ़ावा देना।
यह पदयात्रा विभिन्न राज्यों से होकर गुजरने वाली है, जहाँ पं. शास्त्री अपने अनुयायियों के साथ धार्मिक कार्यक्रम, प्रवचन और सामूहिक भक्ति आयोजन करेंगे।
हालाँकि, इस यात्रा की घोषणा के बाद से ही कुछ सामाजिक संगठनों और व्यक्तियों ने आशंका जताई कि इस तरह की धार्मिक यात्राएँ सांप्रदायिक तनाव या सामाजिक विभाजन को जन्म दे सकती हैं, यदि इसे सही नियमन के बिना संचालित किया जाए।
🔹 दामोदर यादव का सामने आना
इन्हीं चिंताओं के बीच दामोदर यादव, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता और जनहित मुद्दों पर सक्रिय व्यक्ति माने जाते हैं, सामने आए।
उन्होंने घोषणा की कि वे इस पदयात्रा को रोकने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाएँगे।
उनका तर्क है कि ऐसी यात्राएँ यदि प्रशासन की अनुमति और नियंत्रित व्यवस्था के बिना की जाती हैं, तो इससे समाज में असंतोष फैल सकता है और कानून-व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि —
“मैं दतिया में एफआईआर कराने नहीं गया हूँ, बल्कि अदालत के माध्यम से यह सुनिश्चित कराना चाहता हूँ कि ऐसी पदयात्राएँ कानून के दायरे में रहें और सामाजिक सौहार्द बना रहे।”
यह बयान इस पूरे विवाद को एक कानूनी और वैचारिक आयाम दे देता है।
🔹 मीडिया और जनता की प्रतिक्रिया
जैसे ही दामोदर यादव का बयान सामने आया, सोशल मीडिया पर चर्चाओं की बाढ़ आ गई।
कुछ लोगों ने इसे एक साहसिक कदम बताया, यह कहते हुए कि “अगर कोई भी धार्मिक आयोजन समाज में तनाव पैदा कर सकता है तो प्रशासन को उसे नियंत्रित करने का अधिकार है।”
वहीं पं. धीरेंद्र शास्त्री के समर्थकों का कहना है कि “यह सनातन धर्म और उसकी परंपराओं को कमजोर करने की साजिश है।”
यह द्वंद्व — आस्था बनाम प्रशासनिक नियंत्रण — भारतीय लोकतंत्र की उस संवेदनशील रेखा को सामने लाता है जहाँ धर्म, राजनीति और कानून आपस में टकराने लगते हैं।
🧾 भाग 2 — दामोदर यादव का पक्ष और उनकी याचिका के कानूनी आधार
दामोदर यादव का नाम अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में तब आया जब उन्होंने मीडिया के सामने यह घोषणा की कि वे बागेश्वर धाम के पं. धीरेंद्र शास्त्री महाराज की प्रस्तावित “सनातन एकता पदयात्रा” को रोकने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर करेंगे।
उनका यह कदम केवल एक विरोध नहीं है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के नियमन के बीच संतुलन पर उठाया गया सवाल है।
🔹 दामोदर यादव कौन हैं?
दामोदर यादव एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो लंबे समय से समानता, शिक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर काम करते रहे हैं।
वे खुद को किसी धर्म या राजनीतिक विचारधारा से ऊपर बताकर “जनहित में सक्रिय नागरिक” मानते हैं।
उनका कहना है कि समाज में धार्मिक आयोजन तब तक स्वागत योग्य हैं जब तक वे “एकता और शांति” को बढ़ावा दें — लेकिन यदि उनमें विभाजन या उकसावे की संभावना दिखे, तो कानून को हस्तक्षेप करना चाहिए।
🔹 याचिका का उद्देश्य
दामोदर यादव ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनकी याचिका का मकसद पं. धीरेंद्र शास्त्री या किसी धर्म को निशाना बनाना नहीं है।
उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि —
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ऐसी कोई भी बड़ी धार्मिक पदयात्रा प्रशासन की अनुमति और निगरानी में ही आयोजित की जाए।
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यात्रा के दौरान किसी प्रकार की सांप्रदायिक टिप्पणी या भड़काऊ भाषण न हो।
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सार्वजनिक मार्गों और स्थलों पर भीड़ के कारण आवागमन या कानून-व्यवस्था में बाधा न आए।
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यात्रा आयोजक पूर्व में स्थानीय प्रशासन और पुलिस को पूरी जानकारी दें, ताकि सुरक्षा व्यवस्था की जा सके।
उनका यह दृष्टिकोण यह बताता है कि वे निषेध नहीं, बल्कि नियमन (Regulation) की मांग कर रहे हैं।
🔹 उनका बयान — “मैं एफआईआर कराने नहीं गया”
कई मीडिया रिपोर्टों में शुरू में यह अफवाह फैली कि दामोदर यादव “दतिया” में एफआईआर दर्ज कराने गए हैं।
लेकिन बाद में उन्होंने स्वयं स्पष्ट किया कि —
“मैं किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ एफआईआर कराने नहीं गया हूँ।
मैं तो न्यायालय से यह प्रार्थना करूंगा कि ऐसी पदयात्राएँ कानून के दायरे में संचालित हों, ताकि समाज में शांति और सौहार्द बना रहे।”
इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनका कदम व्यक्तिगत विरोध नहीं, बल्कि संवैधानिक मार्ग पर आधारित है।
🔹 कानूनी दृष्टि से उनकी याचिका का आधार
भारतीय संविधान में हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28) प्राप्त है।
लेकिन साथ ही, यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है।
अनुच्छेद 25(1) में यह भी कहा गया है कि —
“राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के हित में इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है।”
यानी अगर कोई धार्मिक आयोजन लोक व्यवस्था या सामाजिक शांति के लिए खतरा बनता है, तो सरकार या न्यायालय उसे नियंत्रित या रोक भी सकता है।
दामोदर यादव की याचिका इसी संवैधानिक प्रावधान पर आधारित होगी।
वे यह तर्क दे सकते हैं कि —
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प्रस्तावित “सनातन एकता पदयात्रा” के दौरान भीड़, नारेबाज़ी या धार्मिक बयानबाज़ी से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
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पदयात्रा के मार्ग में आने वाले क्षेत्र संवेदनशील (Communally Sensitive) हो सकते हैं।
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प्रशासन को पहले से पर्याप्त समय और योजना की आवश्यकता होती है, जो इस यात्रा के अचानक प्रचार से प्रभावित हो रही है।
इसलिए न्यायालय से उनका अनुरोध होगा कि वह प्रशासन को निर्देश दे कि वह या तो इस पदयात्रा की अनुमति कड़े नियमों के तहत दे, या फिर अस्थायी रोक (Stay Order) जारी करे।
🔹 याचिका में संभावित मांगें
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, दामोदर यादव अपनी याचिका में निम्नलिखित मांगें कर सकते हैं —
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सरकार से यह सुनिश्चित करने का निर्देश कि पदयात्रा से पहले पूर्ण सुरक्षा योजना बने।
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आयोजकों से शपथपत्र लिया जाए कि यात्रा के दौरान कोई भड़काऊ या राजनीतिक वक्तव्य नहीं होगा।
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यात्रा के लिए प्रशासन से पूर्व अनुमति के बिना कोई कार्यक्रम न किया जाए।
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यात्रा मार्ग में आने वाले सार्वजनिक स्थलों पर शांति और यातायात व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
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किसी भी विवाद की स्थिति में न्यायालय की निगरानी में जांच या रिपोर्टिंग की जाए।
🔹 न्यायालय का रुख क्या हो सकता है?
कानूनी तौर पर न्यायालय ऐसे मामलों में दो बातों को संतुलित करने की कोशिश करता है —
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नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता,
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और राज्य का कर्तव्य कि वह सार्वजनिक शांति और सुरक्षा बनाए रखे।
इसलिए अदालत इस पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय यह कह सकती है कि यात्रा आयोजित की जा सकती है, लेकिन प्रशासनिक अनुमति और शर्तों के साथ।
यानी, अदालत का निर्णय संभवतः संयम और नियंत्रण पर आधारित रहेगा।
🔹 समाज में संदेश
दामोदर यादव का यह कदम यह संदेश देता है कि आस्था का सम्मान और कानून का पालन — दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
भारत जैसे विविधताओं वाले देश में यह जरूरी है कि धार्मिक आयोजन लोगों को जोड़ें, न कि बाँटें।
यदि कोई व्यक्ति कानून के दायरे में रहकर समाज की शांति के लिए न्यायालय से अपील करता है, तो यह लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत है।